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पद्मासन (Lotus Pose)

इस आसन में पैरों का आधार पद्म अर्थात कमल जैसा बनने से इसको ‘पद्मासन या कमलासन’ कहा जाता है। घेरंड तथा शाण्डिल्य आदि ऋषियों ने इस आसन की बड़ी प्रशंसा की है। गृहस्थों के लिए भी यह आसन बहुत ही अनुकूल है। स्त्रियाँ व दुबले आदमी तथा बच्चे भी इसका अभ्यास कर सकते हैं।

padmasana

पद्मासन करने की विधि (Lotus Pose for Beginners: Step by step Guide)

Step 1: सर्वप्रथम योग आसन के ऊपर स्वस्थ होकर बैठे।

Step 2: अब रेचक करते करते दाहिने पैर को मोड़कर बाँई जंघा पर रखें। बायें पैर को मोड़कर दाहिनी जंघा पर रखें। अथवा पहले बायाँ पैर और बाद में दाहिना पैर भी रख सकते हैं। पैर के तलुवे ऊपर की ओर और एड़ी नाभि के नीचे रहे घुटने जमीन से लगे रहे।

Step 3: सिर, गरदन, छाती, मेरुदण्ड आदि पूरा भाग सीधा और तना हुआ रहे। दोनों हाथ घुटनों के ऊपर जानमुद्रा में रहे। (अंगूठे को तर्जनी अंगुली के नाखून से लगाकर शेष तीन अंगुलियाँ सीधी रखने से ज्ञानमुद्रा बनती है।) अथवा बायें हाथ को गोद में रखें। हथेली ऊपर की और रहे उसके ऊपर उसी प्रकार दाहिना हाथ रखें। दोनों हाथ की अंगुलियों परस्पर लगी रहेंगी। दोनों हाथों को घुटनों पर भी रख सकते हैं।

रेचक पूरा होने के बाद कुम्भक करे प्रारंभ में पैर जंघाओं के ऊपर पैर न रख सकें तो एक ही पैर रखें। पैर में झनझनाहट हो तो भी निराश न होकर अभ्यास चालू रखें। अशक्त या रोगी को चाहिए कि वह जबरदस्ती पद्मासन में न बैठे पद्मासन सशक्त एवं निरोगी के लिए है।

समय: हर तीसरे दिन समय की अवधि एक मिनट बढ़ाकर 20-20 मिनट तक पहुँचना चाहिए। आँखें बंद अथवा खुली भी रख सकते हैं। शरीर सीधा और स्थिर रखें दृष्टि को एकाग्र बनायें।

पद्मासन से लाभ (Benefits of Headstand in Hindi)

प्राणायाम के अभ्यासपूर्वक यह आसन करने से नाड़ीतंत्र शुद्ध होकर आसन सिद्ध होता है। पद्मासन में बैठने से शरीर की ऐसी स्थिति बनती है जिससे श्वसन तंत्र, जानतंत्र और रक्त परिसंचरण तंत्र सुव्यवस्थित ढंग के कार्य कर सकते हैं। फलतः जीवनशक्ति का विकास होता है। पद्मासन का अभ्यास करने वाले साधक के जीवन में एक विशेष प्रकार की आभा प्रकट होती है। इस आसन के द्वारा योगी, संत, महापुरुष महान हो गये हैं। और पढ़े: सिद्धासन (Adept Pose)

पद्मासन के अभ्यास से उत्साह में वृद्धि होती है। स्वभाव में प्रसन्नता बढ़ती है। मुख तेजस्वी बनता है। बुद्धि का अलौकिक विकास होता है। चित में आनन्द उल्लास रहता है। चिन्ता, शौक, दुःख, शारीरिक विकार दब जाते हैं। कुविचार पलायन होकर सुविचार प्रकट होने लगते हैं। पद्मासन के अभ्यास से रजस और तमस के कारण व्यय बना हुआ चित शान्त होता है सत्यगुण में अत्यंत वृद्धि होती है। और पढ़े: वज्रासन (Thunderbolt)

प्राणायाम, सात्विक मिताहार और सदाचार के साथ पद्मासन का अभ्यास करने से अंतःस्रावी ग्रंथियों को विशुद्ध रक्त मिलता है। फलतः व्यक्ति में कार्यशक्ति बढ़ने से भौतिक एवं आध्यात्मिक विकास शीघ्र होता है। बौद्धिक मानसिक कार्य करने वालों के लिए चिन्तन मनन करने वाली के लिए एवं विद्यार्थियों के लिए यह आसन खूब लाभदायक है। चंचल मन को स्थिर करने के लिए एवं वीर्यरक्षा के लिए या आसन अद्वितिय है। श्रम और कष्ट रहित एक घण्टे तक पद्मासन पर बैठने वाले व्यक्ति का मनोबल खूब बढ़ता है।

यदि भाँग गाँजा, चरस, अफीम, मदिरा, तम्बाकू आदि व्यसनों में फंसे हुए व्यक्ति इन व्यसनों से मुक्त होने की भावना और दृढ़ निश्चय के साथ पद्मासन का अभ्यास करें तो उनके दुर्व्यसन सरलता से और सदा के लिए छूट जाते हैं। चौरी, जुआ, व्यभिचार या हस्तदोष की बुरी आदत याले युवक-युवतियों भी इस आसन के द्वारा उन सब कुसंस्कारों से मुक्त हो सकते हैं। और पढ़े: शीर्षासन (Head Stand Pose)

कुष्ठ रक्तपित, पक्षाघात, मलावरोध से पैदा हुए रोग, क्षय, दमा, हिस्टीरिया धातुक्षय, कैन्सर, उदरकृमि, त्वचा के रोग, वात-कफ प्रकोप आदि रोग पद्मासन के अभ्यास से नट हो जाते हैं। अनिद्रा के रोग के लिए यह आसन रामबाण इलाज है। इससे शारीरिक मोटापन कम होता है। शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए यह आसन सर्वोत्तम है।

पद्मासन में बैठकर उड्डीयान बन्ध, जालंधर बन्ध तथा कुम्भक करके छाती एव पेट को फुलाने कि क्रिया करने से वक्षशुद्धि एवं कण्ठशुद्धि होती है। फलतः भूख खुलती है भोजन सरलता से पचता है, जल्दी थकान नहीं होती। स्मरणशकि एवं आत्मबल में वृद्धि होती है।

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