शतावरी (Shatavari)

शतावर या शतावरी, एक वनौषधीय लता है। यह भारत, श्री लंका तथा पूरे हिमालयी क्षेत्र में उगता है। शतावर अपने औषधीय गुणों के कारण भी जाना जाता है इसलिए आजके इस लेख में हम आपको औषधीय गुणों और प्रयोग के बारे में जानेंगे..

Shatavari

शतावरी का विभिन्न भाषाओं में नाम (Shatavari Called in Different Languages)

वैज्ञानिक नामAsparagus racemosus (एस्पेरागस रेसमोसुस)
अंग्रेज़ी  Wild asparagus (वाईल्ड एस्पैरागस)
हिंदी सतावर, सतावरि, सतमूली, शतावरी, सरनोई
संस्कृतशतावरी, शतपदी, शतमूली, महाशीता, नारायणी, काञ्चनकारिणी, पीवरी, सूक्ष्मपत्रिका, अतिरसा, भीरु, नारायणी, बहुसुता, बह्यत्रा, तालमूली, नेटिव एस्पैरागस (Native asparagus)
गुजराती एकलकान्ता (Ekalkanta), शतावरी (Shatavari)
मराठीअश्वेल (Asvel), शतावरी (Shatavari)
नेपाली सतामूलि (Satamuli), कुरीलो (Kurilo)
बंगाली शतमूली (Shatamuli), सतमूली (Satmuli)
ओडिया चोत्तारु (Chhotaru), मोहनोले (Mohnole)
मलयालम शतावरि (Shatavari), शतावलि (Shatavali)
तमिल किलावरि (Kilavari), पाणियीनाक्कु (Paniyinakku)
तेलगूछल्लागडडा (Challagadda), एट्टावलुडुटीगे (Ettavaludutige);
अरबी शकाकुल (Shaqaqul)

शतावरी वृक्ष का सामान्य परिचय (Introduction of Shatavari in Hindi)

शतावर या शतावरी, एक वनौषधीय लता है, जो 1 से 2 मीटर तक लंबी बेल होती हैं। शतावर के नीचे की सैकड़ों जड़ें ‘शतावरी’ कहलाती हैं और यही औषधीय उपयोग में लायी जाती है। शतावर या शतावरी को ‘सफ़ेद मूसली’ भी कहते हैं।

शतावरी की लताएँ झाड़ों के ऊपर बहुत ऊँची चढ़ जाती हैं। इसमें थोड़े-थोड़े अन्तर पर तीक्ष्ण काँटे रहते हैं। इसके पत्ते बहुत महीन, सोया के पत्तों की तरह होते हैं। इसके फूल सफेद और छोटे होते हैं। शतावर की सामान्यतः 2 प्रकार के पाए जाते है-

  1. बड़ी शतावरी
  2. छोटी शतावरी

छोटी शतावर की वेलों से बड़ी शतावरी की वेलें बड़ी रहती हैं। इस बेल के नीचे जमीन के अन्दर सैकड़ों जड़ें फैली हुई रहती हैं। एक-एक बेल के नीचे से दस-दस सेर तक शतावरी की जड़ें प्राप्त हो जाती हैं। इन जड़ों के ऊपर हरे रङ्ग का पतला छिलका रहता है। इस छिलके को निकाल देने पर भीतर से दूध के समान सफेद रङ्ग की जड़ें निकलती हैं।

शतावरी का आयुर्वेदिक और यूनानी गुणधर्म (Ayurvedic & Unani Properties of Shatavari)

आयुर्वेदिक मत- आयुर्वेदिक मत से शतावरी भारी, शीतल, कड़वी, मधुर, रसायन, बुद्धिवर्धक, अग्नि दीपक, पौष्टिक, निग्घ, नेत्रों को हितकारी, गुल्मनाशक, अतिसार निवारक, कामोद्दीपक, स्तनों में दूध बढ़ाने वाली, बलकारक तथा बात, रक्तपित्त और सूजन को दूर करनेवाली होती है। और पढ़ें: आयुर्वेद

शतावरी को आयुर्वेद में ‘औषधियों की रानी’ माना जाता है। इसकी गांठ या कंद का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें जो महत्वपूर्ण रासायनिक घटक पाए जाते हैं वे हैं ऐस्मेरेगेमीन ए नामक पॉलिसाइक्लिक एल्कालॉइड, स्टेराइडल सैपोनिन, शैटेवैरोसाइड ए, शैटेवैरोसाइड बी, फिलियास्पैरोसाइड सी और आइसोफ्लेवोंस।

यूनानी मत- यूनानी मत से इसकी जड़ किंचित मीठी, कामोद्दीपक, मृदुविरेचक, कफनिस्सारक, स्तनों में दूध पैदा करने वाली और पौष्टिक होती है। यह गुर्दे और यकृत की बीमारियों को होती है। यह सुजाक, पुरातन प्रमेह और मूत्र की जलन को दूर करती है। और पढ़ें: वैकल्पपिक चिकित्सा पद्धति की सूचि

शतावरी के औषधीय प्रयोग (Use of Shatawri in various diseases in Hindi)

सतावर का इस्तेमाल दर्द कम करने, महिलाओं में स्तन्य (दूध) की मात्रा बढ़ाने, मूत्र विसर्जनं के समय होने वाली जलन को कम करने और कामोत्तेजक के रूप में किया जाता है। इसकी जड़ तंत्रिका प्रणाली और पाचन तंत्र की बीमारियों के इलाज, ट्यूमर, गले के संक्रमण, ब्रोंकाइटिस और कमजोरी में फायदेमंद होती है। यह पौधा कम भूख लगने व अनिद्रा की बीमारी में भी फायदेमंद है। इसे महिलाओं के लिए एक बढ़िया टॉनिक माना जाता है।

बाजिकरण – शतावरी का पाक बनाकर सेवन करने से अथवों दूध के साथ इसके चूर्ण की खीर बनाकर खाने से मनुष्य की कामशक्ति जाग्रत होती है और उसका वीर्य बढ़ता है।

अनिद्रा-दूध में शतावरी के चूर्ण की खीर बना कर उस खीर में घी मिलाकर खिलाने से अनिद्रा के रोगी को नींद आ जाती हैं। और पढ़े: अनिंद्रा कारण और उपचार

मूत्र विकार- शतावरी और गोखरू का शर्बत बनाकर पीने से मूत्र विकार मिटते हैं।

खांसी: यदि रोगी खांसते-खांसते परेशान हो तो शतावरी चूर्ण 1.5 ग्राम, वसा के पत्ते का रस 2.5 मिली, मिश्री के साथ लें और लाभ देखें।

दूध न उतरना: प्रसूता स्त्रियों में दूध न आने की समस्या शतावरी का चूर्ण पांच ग्राम गाय के दूध के साथ देने से लाभ मिलता है।

पुरुष रोग: पुरुष यौन शिथिलता से परेशान हो तो शतावरी पाक या केवल इसके चूर्ण को दूध के साथ लेने से लाभ मिलता है।

मूत्र रोग: यदि रोगी को मूत्र से संबंधित विति हो तो शतावरी को गोखरू के साथ लेने से लाभ मिलता है।

प्रमेह, स्वप्नदोष: शतावरी मूल का चूर्ण 2.5 ग्राम मिश्री 2.5 ग्राम को एक साथ मिलाकर पांच ग्राम की मात्रा में रोगी को सुबह-शाम गाय के दूध के साथ देने से प्रमेह, स्वप्नदोष में लाभ मिलता है।

धातु वृद्धि: शतावरी के जड़ के चूर्ण को 5-10 ग्राम की मात्रा में दूध के साथ नियमित रूप से सेवन करने से धातु वृद्धि होती है।

पित्त रोग: शतावरी के रस को शहद के साथ लेने से जलन, दर्द एवं अन्य पित्त से संबंधित बीमारियों में लाभ मिलता है।

माइग्रेन: शतावरी की ताजी जड़ को मोटा-मोटा कूट कर इसका रस निकाल लें, फिर इसमें बराबर मात्रा में तिल का तेल मिलाकर पका लें। इस तेल को सिर में लगाने से माइग्रेन में लाभ मिलता हैं। और पढें: माइग्रेन: कारण, लक्षण और उपचार

Medicinal benefits of Ayurvedic herb Shatavari | Acharya Balkrishna (Patanjali)

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