गुंजा या रत्ती (Jequirity)

गुंजा या रत्ती (Coral Bead) लता जाति की एक वनस्पति है। शिम्बी के पक जाने पर लता शुष्क हो जाती है। गुंजा के फूल सेम की तरह होते हैं। शिम्बी का आकार बहुत छोटा होता है, परन्तु प्रत्येक में 4-5 गुंजा बीज निकलते हैं अर्थात सफेद में सफेद तथा रक्त में लाल बीज निकलते हैं। अशुद्ध फल का सेवन करने से विसूचिका की भांति ही उल्टी और दस्त हो जाते हैं। इसकी जड़े भ्रमवश मुलहठी के स्थान में भी प्रयुक्त होती है।

Gunja

विभिन्न भाषाओं में गुंजा का नाम (Gunja Called in Different Languages)

वैज्ञानिक नामAbrus Precatorius
अंग्रेज़ी Coral Bead, Jequirity
हिंदीगुञ्जा, चिरमिटी, घुंघची, गौथि, रत्ती
संस्कृतसंस्कृत-गुञ्जा, गुज्जिका, अङ्गारवल्लरी, रत्तिका, कृष्णचूड़िका, शिखंडी, सौम्या, कम्बोजि श्वेतगुंजाब
बंगाली कुन्च, गुन्च, चुनहटी
गुजरातीचनोटी, चणोटीराती, चणोटीघोली
मराठीघुंघची, गुन्जा
कन्नड़ गूलगंजी,
मलयालम कुन्नी, कुवंन्ना
ओडियाकैंच
तेलगूअतिमपुरम, गुरिजा गुयुविजा
तमिल अरिंगम, कदम, कुरुविदम, मदुरगम्

गुंजा पौधे का परिचय (Introduction of Jequirity Plants in Hindi)

यह एक पराश्रयी लता है, जो जंगलों में उत्पन्न होती है। इसकी शाखाएँ लचीली होती हैं। इसके पत्ते इमली के पत्तों की तरह होते हैं और खाने में मीठे लगते हैं। इसके फूल सेम के फूलों की तरह और फली भी सेम के सदृश गुच्छे वाली होती हैं। ये फलियां रुइँदार होती हैं। इनके अन्दर जिरमियें निकलती हैं जो अत्यन्त सुन्दर लाल रंग की मुंह पर काले धब्बे वाली होती हैं। ये ऊपर से अत्यन्त चिकनी और चमकदार होती हैं। इसकी एक जाति और होती है, जिसका रंग बिल्कुल सफेद होता है उसको सफेद घुंघची कहते हैं।

गुंजा का आयुर्वैदिक और यूनानी गुण धर्म (Ayurvedic Properties of Jequirity in Hindi)

आयर्वेद आयुर्वैदिक मतानुसार दोनों प्रकार की घुंघची स्वादिष्ट, कड़वी, बलकारक, गरम, कसैली, चर्मरोग नाशक, केशों को हितकारी, रुचिकारक, शीतल, वीर्यवर्धक तथा नेत्र रोग, विष पित्त, इन्द्रलुप्त, व्रण, कृमि, राक्षस, ग्रह पीड़ा, कण्डू, कुष्ठ, कफ, ज्वर, मुख रोग, वात, भ्रम, श्वांस, तृषा, मोह और मद का नाश करती है। इसके बीज वमनकारक और शूल नाशक होते हैं। इसकी जड़ और पत्ते विषनाशक होते हैं।

इसकी जड़ और पत्ते मोठे होते हैं। इसका फल कड़वा, कसैला, कामोद्दीपक और विषैला होता है। यह कफ कारक, पित्तनिवारक, सौन्दर्यवर्धक और रुचिकारक होता है। नेत्र रोग, खुजली, चर्म रोग और घावों में भी यह उपयोगी है। इसकी जड़ और इसके पत्ते ज्वर, मुंह की सूजन, इमा, प्यास, क्षय की ग्रंथि और दांतों की सड़न में लाभदायक है।

यूनानी- यूनानी मत से चिरमिटी तीसरे दर्जे में सर्द और खुश्क है। इसकी हर किस्म तेज होती है और जख्म पैदा करती है। इसके मगज को पीस कर शहद में मिलाकर उसमें बत्ती तर करके रखने से बदगोश्त साफ हो जाता है। बच्चों के कान में एक प्रकार का रोग हो जाता है जिसको हंगुड़ा कहते हैं, उसमें इसकी बत्ती बना कर रखने से बहुत लाभ होता है। सफेद चिरमिटी के मगज को पीसकर तिल के तेल में मिलाकर सोते वक्त मुंह पर मल कर सवेरे धो डालने से चेहरे की झाई और मुंहासे मिट जाते हैं।

आनर का विभिन्न रोगों में प्रयोग (Use of Jequirity in various Diseases)

डेंड्रफ: गुंजा की जड़, बीज तथा पत्तियों के पेस्ट को सिर पर लगाएं। आधे घंटे बाद बाल शैम्पू से धोएं। सप्ताह में एक बार निरन्तर लगाने से डेन्ड्रफ खत्म होने में मदद मिलती है।

बालो की वृद्धि: गुंजा के बीजों – को भृंगराज (एक्लिप्टा एल्वा) तेल में पकाकर सिर में लगाने से बालों में वृद्धि होती है।

जोड़ो का दर्द: समान मात्रा में निर्गुण्डी, एरण्ड की पत्तियों और गुंजा के बीज को हल्का गर्म कर लेप पुलटिस लगाने से जोड़ों का दर्द, सूजन, साइटिका दर्द, सर्वाइकल स्पोंडेलोसिस इत्यादि में आराम मिलता है।

गुंजा के आयुर्वेदिक गुण | Acharya Balkrishna

चेतावनी: गुंजा एक जहरीली औषधि है, इसका गलत तरीके अथवा अधिक मात्रा में सेवन हानिकारक हो सकता है। अतः इसका इस्तमाल अनुभवी के देख रेख में ही करना चाहिए।

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