अलसी (Flax Seed)

अलसी (Flax Seed) उत्पन्न करने वाले देशों में भारत का स्थान चौथा है. यहाँ कुल उत्पादन का 12% भाग प्राप्त होता है। भारत मे अलसी की खेती मुख्यतः उत्तर प्रदेश, बिहार, ओडिशा, गुजरात, मध्य प्रदेश, पश्चिमी बंगाल और महाराष्ट्र में होती हैं।

Flax Seeds

अलसी का विभिन्न भाषाओं में नाम (Flax Seed Called in Different Languages)

वैज्ञानिक नामलिनम् युसिटेटिसिमम् (Linum Usitatissimum)
अंग्रेज़ी लिनसीड (Linseed), फ्लैक्स सीड (Flax Seed)
हिंदीअलसी, तीसी
संस्कृतअलसी, नील,पुष्पी, क्षुमा, उमा
गुजरातीअलसी
मराठीजवसु
नेपालीअलसी
बंगालीमशिना
तेलगूबित्तु, अलसी, अतसी
अरबीकत्तान
फ़ारसीतुख्मे, कत्तान, जागिरा

अलसी का सामान्य परिचय (introduction of Flax Seed)

ब्रह्य स्वरूप: अलसी का पौधा 2 से 4 फुट ऊंचा होता है पत्ते रेखाकार और 1 से 3 इंच लंबे होते हैं। फल कलश के समान आकार के होते हैं, जिसमें प्रायः 10 बीज निकलते हैं।

अलसी के बीज ललाई लिए चपटे, अंडाकार और चमकदार होते हैं। इन बीजों से ही अलसी का तेल बनता है। इसकी जड़ सफेद रंग की, पेंसिल जितनी मोटी और 4 से 10 इंच लंबी होती है।

अलसी का उत्पादन (Production of flax seeds)

भारत में दो प्रकार की अलसी उत्पन्न की जाती है-

(1) प्रायद्वीपीय अलसी: इस प्रकार की बड़ी अलसी को गहरी काली मिट्टी की आवश्यकता होती है, जो कुछ समय तक नमी संचित रख सके।

(2) मैदानी अलसी: इस प्रकार की छोटी अलसी कछारी मिट्टी में पैदा की जाती है.

भौगोलिक दशाएँ– अलसी के लिए ठण्डी जलवायु की आवश्यकता होती है। इसके लिए औसत तापमान 15°C से 25°C उपयुक्त रहता है। अलसी सभी प्रकार की काफी नमी वाली मिट्टी में पैदा हो जाती है। इसके लिए वर्षा की मात्रा 75 से 150 सेमी तक आवश्यक होती है।

आयुर्वेदिक मतानुसार: अलसी मधुर, तिक्त, गुरु, स्निग्ध, गरम प्रकृति, भारी, पाक में तीखी, बात नाशक, कफ-पित्त वर्धक, नेत्र रोग, व्रण शोथ एवं वीर्य दोषों का नाश करती है। इसका तेल मधु, वात नाशक, कुछ कसैला, स्निग्ध, उष्ण, कफ़ और खांसी नाशक, पाक में चरपरा और नेत्रों के लिए हानिकारक है। और पढ़ें: जानें, आयुर्वेद की ABCD

यूनानी मतानुसार: अलसी गर्म होती है। यह खांसी, गुर्दे की तकलीफों में, कामोद्दीपक, दुग्धवर्धक, मासिक धर्म नियामक, व्रण, दाद में लाभकारी है।

अलसी में पौषक तत्व (Nutritional value of Flax Seed)

वैज्ञानिक मतानुसार अलसी के बीजों में 35-45 प्रतिशत तक स्थिर तेल होता है। इस तेल में लाइनोलिक एसिड युक्त ग्लिसरॉल का मिश्रण होता है। इसके अतिरिक्त आर्द्रता 6.6 प्रतिशत, कार्बोहाइड्रेट 28.8 प्रतिशत प्रोटीन 25 प्रतिशत, खनिज 2.4 प्रतिशत, भस्म 3 से 5 प्रतिशत तक पाए जाते हैं। भस्म (राख) में कैल्शियम, सोडियम, पोटेशियम, मैग्नेशियम, लोहा, गंधक, फास्फोरस आदि तत्त्व होते हैं।

अलसी के बीजों में एक विषाक्त ग्लूकोसाइड लिनामेरिन भी होता है, जो अलसी के पत्ते, तने, फूल, जड़ में भी मौजूद रहता है। जिसके दुष्परिणाम स्वरूप इसे खाने से पशुओं पर घातक प्रभाव पड़ता है। यहां तक कि पशुओं की मृत्यु भी हो सकती है।

विभिन्न रोगों में प्रयोग (Use of Flax Seed in various Diseases)

वीर्य वर्द्धक: अलसी का चूर्ण बराबर की मात्रा में मिसरी मिलाकर दो बार नियमित रूप से दूध के साथ कुछ हफ्ते तक पीने से वीर्य बढ़ता है।

मुंह के छाले: अलसी का तेल छालों पर दिन में 2-3 बार लगाएं। व्रण, फोड़ा अलसी के बीजों के एक चौथाई बराबर सरसों के साथ पीसकर गरम कर लें। फिर लेप बनाकर लगाएं। दो-तीन बार के लेप से फोड़ा बैठ जाएगा या पक कर फूट जाएगा।

कब्ज़: रात्रि में सोते समय एक से दो चम्मच अलसी के बीज ताजा पानी से निगल लें। आंतों की खुश्की दूर होकर मल साफ होगा। अलसी का तेल एक चम्मच की मात्रा में सोते समय पीने से यही लाभ मिलेगा। और पढ़ें: कब्ज कारण और उपचार

पीठ, कमर का दर्द: सोंठ का चूर्ण अलसी के तेल में गर्म करके पीठ, कमर की मालिश करने से दर्द की शिकायत दूर हो जाती है।

कान दर्द: अलसी के बीजों को प्याज के रस में पकाकर छान लें। इसे दुखते कान में 2-3 बूंदें टपकाएं, दर्द दूर हो जाएगा।

स्तनों में दूध की वृद्धि : अलसी के बीज एक-एक चम्मच की मात्रा में सुबह-शाम पानी के साथ निगलने से प्रसूता के स्तनों में दूध की वृद्धि होती है।

खांसी: सिंके हुए अलसी के बीजों का चूर्ण बना लें। इसमें एक चम्मच की मात्रा में शहद मिलाकर चटाने से खांसी दूर होती है।

शारीरिक दुर्बलता: एक गिलास दूध के साथ सुबह-शाम एक-एक चम्मच अलसी के बीज निगलते रहने से शारीरिक दुर्बलता दूर होकर पुष्टता आती है। और पढ़ें: वजन बढ़ाने के लिए डाइट प्लान

मूत्र में दाह, जलन: अलसी के बीजों का काढ़ा एक-एक चम्मच की मात्रा में दिन में 3 बार पीने से मूत्र नली की जलन और मूत्र संबंधी कष्ट दूर होता है।

कामोद्दीपन हेतु: 50 ग्राम अलसी के बीजों में 10 ग्राम काली मिर्च मिलाकर पीस लें। इस चूर्ण में से एक-एक चम्मच शहद के साथ सुबह-शाम सेवन करें।

हृदय का बल: अलसी के फूलों को छाया में सुखाकर उनका चूर्ण बना लें। इस चूर्ण में से एक चम्मच चूर्ण शहद के साथ दिन में 3 बार नियमित रूप से कुछ दिनों तक सेवन करने से हृदय को बल मिलता है।

अलसी का पुल्टिस: अलसी का पुल्टिस सब पुल्टिसो मे श्रेष्ठ माना जाता है। इस पुल्टिस को गठिया के सूजन में लगाने से विशेष लाभ होता देखा गया है।


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