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डिप्थीरिया (Diphtheria) | Symptoms, Causes & Treatment in Hindi

डिप्थीरिया (Diphtheria) या रोहिणी गले एवं नासिका (Nose) में होने वाला विशिष्ट संक्रामक रोग है। जो अधिकतर बच्चों में पाया जाता हैं। अक्सर लोग इसे गले मे होने के कारण टॉन्सिल समझने की भूल कर बैठते है। जो जानलेवा हो सकता हैं।

Diphtheria
डिप्थीरिया से ग्रसित बच्ची

Quick Facts:

Age: 1 से 10 साल की उम्र के बच्चों में अधिक पाया जाता हैं।
Sex: Not significant factor.
Lifestyle: Not significant factor.
Genetics: Not significant factor.

  • डिप्थीरिया एक संक्रामक रोग है जो ‘कोराइन बैक्टीरियम डिपथीरी’ (Coryn bacterium diphtheriae) नामक बैक्टेरिया से फैलता है।
  • यदि समय रहते उपाय न किया जाए तो बालक की मृत्यु भी हो सकती हैं।
  • भारत मे डिप्थीरिया के प्रतिवर्ष लगभग 1 लाख मामले सामने आते हैं।
  • डिप्थीरिया शीत एवं समशीतोष्ण प्रदेशों में अधिक होता है। इसलिए भारत में यह रोग पहाड़ी प्रदेशों में अधिक पाया जाता है।

डिप्थीरिया क्या है? (What is Diphtheria in Hindi)

डिप्थीरिया रोग कोराइन बैक्टीरियम डिपथीरी (Coryn bacterium diphtheriae) नामक जीवाणु से होता है। यह जीवाणु तीन प्रकार का होता है-

  1. उग्र (gravis),
  2. मध्यम (intermedians)
  3. मृदु (mitis)

ये जीवाणु खांसने, छीकने, थूकने व बोलते समय दूसरों तक पहुंचते हैं और गले की श्लैष्मिक कला में प्रविष्ट होकर वहाँ रोग उत्पन्न कर देते है। इसके अतिरिक्त जीवाणु एक प्रकार के जीव विष को जन्म देता है जिससे हृदय की पेशियों में सूजन आ सकती है अथवा स्नायु तंत्र की खराबी हो सकती है।

डिप्थीरिया के लक्षण (Symptoms of Diphtheria in Hindi)

प्रथम अवस्था: रोग में सर्वप्रथम गले के चारों तरफ लालिमा मालूम दिखाई पड़ती है। तालू के मूल में श्वेत पर्त सी जमी महसूस होती है। दो रोज़ में वह सफेद पर्त झिल्ली बना लेती है। गले में सूजन हो जाती है, रोगी को कोई भी पदार्थ निगलने में कष्ट होता है। थोड़ी-थोड़ी खांसी भी शुरू हो जाती है व श्वास लेने में कष्ट अनुभव होता है। ज्वर 100°F-102°F तक पहुंच जाता है।

दूसरी अवस्था: दूसरी अवस्था में शोथ बढ़ जाता है, श्लैष्मिक कला की पर्त फटकर विष का प्रभाव फैलने लगता है। ज्वर 104° के लगभग हो जाता है, नाड़ी की गति तीव्र हो जाती है और मुख का वर्ण लाल हो जाता है। इसमें प्यास भी अधिक मात्रा में लगती है। बेचैनी और दुर्गन्ध बढ़ जाती है।

तीसरी अवस्था : तीसरी अवस्था बहुत कष्टदायक अवस्था होती है। गर्दन अकड़ जाती है। गला फूल जाता है। रोग का विष नासिका तक फैल जाता है।

चौथी अवस्था: चौथी अवस्था में शोध बढ़ता हुआ सम्पूर्ण गले, नासिका, स्वरयन्त्र तथा अन्य नलिका तक भी पहुंच जाता है। दुर्गन्ध अधिक बढ़ जाती है। शरीर नीला पड़ जाता है। इस अवस्था में प्रायः बचने की सम्भावना बहुत कम रहती है।

डिप्थीरिया क्यो होता है? (What causes Diphtheria)

यह रोग बाल्यावस्था में अधिक होता है। डिप्थीरिया के जीवाणु खांसने, छीकने, थूकने व बोलते समय दूसरों तक पहुंचते हैं। इसके अतिरिक्त मुख की लार, रूमाल, चम्मच पानी का गिलास आदि से भी रोग का प्रसार होता है। और पढ़े: शिशुओ की आम समस्याएं

यदि घर में एक बच्चे को डिप्थीरिया हो जाता है तो दूसरे को भी होने की सम्भावना रहती है। स्वास्थ्य के नियमों के विपरीत आहार-विहार करने से भी यह रोग उत्पन्न हो जाता है। और पढ़े: सेहत के लिए फायदेमंद और हानिकारक फ़ूड कॉम्बिनेशन

खसरा, एन्फ्लुएंजा और गले की अन्य बीमारियों में भी डिप्थीरिया होने की सम्भावना रहती है।

अन्धकारमय, सीलन से भरे स्थान, मल-मूत्र के पास, या गंदे कूड़े वाले स्थानों, सड़ा-बासी और दुर्गन्धित भोजन करने, दूषित स्थान पर रहने एवं दूषित भोजन आदि का सेवन करने से गले में लालिमा उत्पन्न होकर भी इस रोग की उत्पत्ति हो सकती हैं।

डिप्थीरिया घरेलू उपचार और बचाव (Diphtheria Home Remedies in Hindi)

रोग के लक्षण दिखते ही डॉक्टर से संपर्क करें और उनके द्वारा दिए गए निर्देशों का पालन करें।

  • डिप्थीरिया के रोगी को एकान्त कमरे में रखना चाहिए तथा बिस्तरे पर लिटाये रखना चाहिए।
  • गरम पानी से गला बाहर से सेंकना चाहिए।
  • डिफ्थीरिया से बचाव के लिए वैक्सीन लगवाना चाहिए।
  • इसमें कुल्ले अवश्य कराना चाहिए, जिसमें हाइड्रोजन पेरॉक्साइड (hydrogen peroxide) या अन्य औषधियां प्रयुक्त होती है।
  • गले में फूला हुआ सुहागा शहद में मिलाकर या ग्लिसरीन फाए से लगाना चाहिए।
  • दूध, अरारोट, ग्लूकोज़, फलों का रस, काफी, जल आदि तरल पदार्थ पीने को देना चाहिए। कोई ऐसी वस्तु न दें जिसे रोगी को चबाना पड़े।

रोगमुक्ति के पश्चात् भी हृदय की रक्षा के लिए कम से कम तीन सप्ताह तक पूर्ण विश्राम आवश्यक है। उग्र रोग के पश्चात् रोगी तीन मास तक काम करने के योग्य नहीं रहता।

डिप्थीरिया की वैक्सीन (Diphtheria Vaccine)

गले की बीमारी (डिप्थीरिया) से सुरक्षा के लिए बच्चों को डीपीटी का टीका लगवाना चाहिए। ये टीकारण सरकारी अस्पतालों में मुफ्त में उपलब्ध है।

DTP का टीका कब लगाया जाता है: 10 से 12 मास की आयु में डिपथीरिया टॉक्साइड का प्रथम इंजेक्शन, 15-18 मास पर दूसरा, फिर स्कूल प्रवेश के समय अंतिम इंजेक्शन आठ या नौ वर्ष की आयु में दिया जाता है। इससे बालक में जीवन पर्यंत रोगक्षमता बनी रहती है।

Diphtheria FAQs

निष्कर्ष: डिप्थीरिया एक भयंकर बीमारी है। इसका पता लगने पर तुरन्त रोगी को अस्पताल भेजने की व्यवस्था करनी चाहिए ताकि इस रोग के उपद्रवों से रोगी को बचाया जा सकें और प्राणों की रक्षा की जा सके।

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